अंधश्रद्धा और तकनीकी बिकास की कहानी १.

अंधश्रद्धा और तकनीकी बिकास की कहानी इंसानी इतिहास के पहले पन्ने से चलती आयी है.

इंसानी सभ्यता लगातार अपनी जरूरतों को पूरा करने हेतु आविष्कार या खोज करते आये है.

जिससे लगातार वो जीवन को आसान बनाने हेतु नए नए साधन तैयार करता गया.

और जैसे जैसे तकनीकी खोजे होती गयी इंसानी अंधश्रध्दा भी उससे जुड़ती गयी. मानो जैसे बरसों से ये सब होता आया है.

हम पुराने अविष्कार जैसे धुप, अगरबत्ती, दिया इनसे शुरवात करते है. जैसे जैसे सभ्यता का विकास होता गया इक इक खोज मानव के जीवन में उजाला लेन लगे.

जैसे बाती का दिया हमें उजालेके लिए उसकी जरुरत थी. वो दोहरा काम करता था अंधेरेमे उजाला करता था.

 और अग्नि का भी आसानिसे जतन  होता था.

लेकिन उसके साथ देवता का पूजन जुड़ गया और हम आज बिजलिका दिया और बाती का दिया दोनों लगाते है.

वो दिया ना जलाये तो घरके लोग  मनमें आशंकित हो जात्ते है. जैसे कुछ बुरा हुआ हेई.

क्यू वो ये नहीं जानते की ये सिर्फ संस्करोका मनोविज्ञानिक असर मात्र है. वैसे  इत्तर

शरीर पर लगाना पड़ता है.

तो पुरे दालन को सुगन्धित करने हेतु धुप अगरबत्ती का अविष्कार किया गया. ताकि हमारे मनको अच्छा लगे.

लेकिन वो आज जैसे पूजा का सामान बन गया है. अगर एखाद दिन हम दिया लगाना भूल गए तो तुरंत हम कुछ बुरा तो नहीं होगा?

इस बातसे आशंकित हो जाते है. इसका कारन है हमारे मनमे बिठाया गया डर.

इस शिक्षा की शुरवात उन दिनोमे होती है जब घरवाले बच्चे को किसीकी पूजा करना या तो डरना सिखाते है?

हम उसके सवालों सच्चे जबाब नही दे पाते तो डरनेकी धरोवर उसे सोप देते है. और जो हमे हमारे बापजादाने कहा वाही सच है भरोसा रखना सीखो ये सिखाया जाता है.

 

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